Tuesday, 23 October 2012

रावण अपनी चिता को आग लगाके "जय श्री राम" कहता है.

हम चुप है. कुछ नहीं बोलना हमें,
त्यौहार की झूठी ख़ुशी से संतुष्ट है हम.
दिक्कतों की रसोई में हम खीर बना लेते है.
आंसू की दाल में ख़ुशी का तड़का सजा लेते है.

कलयुग में हमारे आस-पास बुराई ही बुराई है.
पर हम रावण का पुतला जला लेते है.
क्युकी हम खुश है कुछ नहीं करना हमें.


हर साल बुराई पर अच्छाई की जीत वाला रावण जलाते है हम.
और झूठी ख़ुशी और झूठे जीत का जश्न मनाते है हम.

चलिए कुछ और सोचते है...


आज जलने वाला रावण भी नकली है और जलाने वाला राम भी.
सच तो ये है की आज उस रावण को बनाने के पैसे भी रावण ही देता है.
और नकली राम तब तक बाण नहीं चलता जब तक असली रावण इशारा नहीं देता है.

नकली रावण को जलाने के बाद असली वाला भाषण देता है,

और हम इसी तरह से बुराई को जलाते रहेंगे ये कहता है.
हसी तो तब आती है जब रावण अपनी ही चिता को आग लगा के जय श्री राम कहता है.

                                                                                    - पंकज मिश्रा.

Tuesday, 2 October 2012

बापू ये क्या सीखा गए ...

जो तुमने किया वो तुम ही कर सकते थे,
तुम्हारी लाठी से तब के लोग डरते थे.
आज २ G और ३ G वाले ये लोग कुछ भी पचा लेते है
चारा नहीं मिलता तो कोयला भी खा लेते है.


राम का नाम लेने वाले मंदिर के बाहर सोते है.
डाकू और चोर अब महलों में होते है.
सरकारी दीवारों पे तेरी तस्वीर की ज्योति है,
बैमानों की कुर्सी उसी के निचे होती है. 

आज अगर बापू तू कही जिंदा होता
चरखा चलाना छोड़ बन्दुक चला रहा होता.
सत्याग्रह की प्रेक्टिस तेरी भी छुट गयी होती,
निकल पड़ता लाठी लेके बाँध लेता धोती.

आज के हालत को अगर तू समझ पाया होता.
तो बापू I AM SURE तुने कुछ और सिखाया होता.

                                   - पंकज मिश्रा.

Monday, 1 October 2012

कहाँ हो भगत जल्दी आओ,

एक बार फिर से वतन ने पुकारा है,
एक बार फिर बस तेरा ही सहारा है.
गांधीजी देखों क्या बोल रहे कोई नहीं सुन रहा,
भ्रष्टाचारी ही स्वयं को देश प्रेमी बोल रहा,

भूखा प्यासा रहके हाथ जोडके थक गए,
यहाँ तो सब बस लात मुक्के वाले रह गये,
कहते है ये की अब इनकी सरकार है,
लगता है इनको अब तुम्हारा इंतज़ार है...

राजगुरु, सुखदेव की तुम फिकर न करो,
आज हर हिन्दुस्तानी मरने को तैयार है,
कहाँ हो भगत जल्दी आओ,
अब बस तुम्हारा ही इंतज़ार है.
                         
                          -पंकज मिश्रा.

Sunday, 30 September 2012

सोने की चिड़िया


कहते थे जिसे सोने की चिड़िया, वो चिड़िया आज मर रही है.
चू चू करने वाली आज हर पल कुहर रही है,


सोने का रंग देखो फीका हो गया है,
पंख भी नहीं रहे मेरा दाना सड़ गया है.


कोयले की आग में मेरा तन जल रहा है.
१००० करोड़ मेरा खा गया मुझे पानी भी नहीं दे रहा है.


बस अब आखरी ही सांस बाकि है मुझमें
अब आख्रिही चींख बची है मेरी,
मेरी लाश को भी खा लेना मेरे मरने के बाद,
अगर और भी कुछ भूख बची हो तेरी.


पंकज मिश्रा.....

Friday, 27 May 2011

हर जगह कोई और है....


मैने पूछा खुदा से, 
जो बुरे लोग और बुराई की बात करने वाले है, वो वहां क्यों नहीं जहाँ बुराई है,
             क्यों वहां कोई और है?
जो सरकार की निंदा करते है, वो सरकार क्यों नहीं, क्यों वहां कोई और है?
जो आतंकवाद खत्म करना चाहते है वो वहां क्यों नहीं, क्यों वहां कोई और है?
         जिनकी जरुरत जहाँ होती है वो वहां क्यों नहीं, क्यों वहां कोई और है?

खुदा ने कहा....   
              हमने उसी को भेजा था जो वहां जाकर कुछ करना चाहता है,
           पर पता नहीं क्यों वहा पहुचते ही हर आदमी कोई और बन जाता है.
                           
                                                                                  -----पंकज मिश्रा.